गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

विवाह :तेरे कितने रूप !

                        विवाह एक सामाजिक संस्था ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति के अनुसार एक महत्वपूर्ण संस्कार है।   ये सृष्टि को सतत चलाने वाला संस्कार अपना स्वरूप बदल रहा है ,   युगों से चली आ रही अवधारणा अब दरकने लगी है।  संस्था आज भी है और शायद मानव जीवन के साथ रहेगी भी । आज के परिवेश में यह नहीं सोचा जा रहा है कि जो विवाह बंधन में बंध रहे है , वे एक सुखद और सफल जीवन व्यतीत करेंगे । शिक्षा , महत्वकांक्षा और आधुनिकता की चाह ने इसके स्थायित्व को प्रभावित किया है। सदियों से चली आ रही कट्टरता अब शिथिल होने लगी है और समय के अनुरूप उसके सुखद परिणाम भी सामने आ रहे है। 
                    
                         इस विषय में कुछ प्रबुद्ध महिलाओं के विचार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. विभिन्न परिवेश से सम्बन्ध रखने वाले लोगों के विचार भी कुछ नया परिणाम ही सामने रखेंगे. --

 डॉ. गायत्री सिंह - अर्मापुर डिग्री कॉलेज की प्राचार्य -  विवाह संस्था अभी भारत में जीवित है लेकिन हाई प्रोफाइल सोसाइटी में जरूर बदलाव के साथ ववाह के प्रति आस्था भी कम हुई है।
       वैदिक रीति से भावनात्मक लगांव ज्यादा रहता है, जब कि  कोर्ट मैरिज से शुरुआत होकर  वापस कोर्ट पर ही रिश्ता टूट भी जाता है। हर जगह ये बात लागू नहीं हो रही है। 
       अंतर्जातीय विवाह का स्थायित्व परिवेश और पारिवारिक स्थिति पर निर्भर करता है। अन्यथा यह ऑनर किलिंग में भी बदल जाता  है।
           लिव इन से सबसे अधिक नुक्सान महिलाओं का हो रहा है और संस्कृति में रची बसी परिवार संस्था को इससे खतरा उत्पन्न हो रहा है।   जिम्मेदारियों से भागना और उन्मुक्त जीवन जीने की जो भावना नयी पीढ़ी में पनप रही है वह सबके लिए ही घातक और अनैतिक भी है।


विभा रानी  - इंडियन आयल अधिकारी , मुंबई - विवाह  से एक भावात्मक रिश्ता बनता है और उसमें स्थायित्व भी होता है।चाहे जिस तरह से करें मन में अगर भावात्मक लगाव है तो वह सफल है।
           विवाह किसी भी पद्धति से हो। शादी भावनाओं से होती है। पद्धति उसे सम्पन्न करने का एक तरीका है। कहाँ तो लोग बिना विवाह के जीवन भर साथ रहते हैं और उनमें आपसी सामंजस्य रहता है।  विवाह एक सामाजिक स्वीकृति है और वह जरूरी भी है।   
             कोई अंतर नही है,  परिवार राजी तो किसी की कोई मजाल नहीं उंगली उठाने की। मेरी और मेरी बेटी की शादी अंतरजातीय और अंतर धार्मिक है। हम दोनों खुश हैं।
           दो वयस्क अपना जीवन जैसा चाहें गुजारने के लिए आज़ाद हैं। ऐसे सवाल केवल विवाद पैदा करते हैं और हमारी मानसिक संकीर्णता को बताते हैं।


शारदा अग्रवाल -  डीवी डिग्री कॉलेज , उरई -- हाँ विवाह संस्कार आज भी जीवित है और रहेगा क्योंकि हम आज भी विवाह से पूर्व कुंडली का मिलान करते हैं। सारे रीति रिवाज पूर्ण करते हैं क्योंकि इसके पीछे  होने से दंपत्ति के भावी जीवन में सुख शांति की कामना होती है।
        वैदिक रीति से विवाह होने पर एक मानसिक संतुष्टि मिलती है और सामाजिक स्वीकृति भी।  परिवार को समाज की नैतिकता का सम्मान करने की शिक्षा भी मिलती है। 
          अंतर्जातीय विवाह से समाज में परम्पराओं का ह्रास हो रहा है क्योंकि दो अलग अलग जातियों में भेद होता है और इससे परिवार को एक दूसरे को स्वीकार करने में परेशानी तो होती ही है।  सामान्य रूप से अंतर्जातीय विवाह कोई भी परिवार ख़ुशी ख़ुशी तो नहीं ही करता है।
          लिव इन भारतीय संस्कृति के खिलाफ है बल्कि हमारे सदियों से चले आ रहे संस्कारों के खिलाफ साजिश है। कोई स्थयित्व नहीं है बल्कि एक स्वच्छंद जीवन को हवा देने वाला है।


संगीता गाँधी - साहित्यकार , नई दिल्ली -- विवाह पवित्र संस्कार है। जैसे जैसे पाश्चात्य प्रभाव बढ़ रहा है ये संस्था अपना महत्व खोने लगी है।   आज का युवा इन सबसे पहले अपने कैरियर को देखता है और  विवाह संस्था की उपेक्षा करने लगे हैं।
           विवाह चाहे वैदिक रीति से हो या कोर्ट मैरिज दोनों ही विवाह के प्रकार है।  भावात्मक बंधन मन की अवस्था है।स्थायित्व में रीति कोई मायने नहीं रखती है।
          अंतर्जातीय  और सजातीय विवाह में स्थायित्व पर असर तब आता है जब निर्णय बहुत जल्दबाजी में लिया गया हो।  लेकिन अगर परिवार की सहमति है तो उनके  स्थायित्व की संभावना होती है नहीं तो भावात्मक कमजोरी इसके टूटने की बात भी सामने ला रहा है ।
            लिव इन परिवार और विवाह संस्था दोनों के लिए घातक है , विशेष रूप से स्त्रियों की स्थिति इसमें दयनीय हो जाती है , मतभेद होने पर पुरुष को परिवार स्वीकार कर लेता है  लेकिन स्त्री को जल्दी स्वीकार करने की प्रवृत्ति अभी,भी समाज में नहीं है और इससे पैदा हुए बच्चे त्रसित होते हैं।
 
   
चित्रा देसाई - साहित्यकार एवं अभिवक्ता , मुंबई --    विवाह संस्था पर संकट बिलकुल नजर आ रहा है क्योंकि रिश्ते के बंधन में कोई बंधना ही नहीं चाहता है।  सिर्फ मैं के लिए कुछ भी कर सकते हैं  , कभी कभी तो अपनी रुचियों और शौक के लिए बच्चों को भी अनदेखा कर दिया जाता है।
          वैदिक रीति से विवाह में और कोर्ट मैरिज में बहुत फर्क है।  कोर्ट मैरिज में एक एंटीसेप्टिक माहौल नजर आता है , जहाँ कुछ भी ऐसा नहीं है कि रिश्तों को निभाने के पक्ष में मुझे ज्यादा फर्क नजर नहीं आता है क्योंकि एक समझदारी के बाद ही कोर्ट मैरिज करते हैं।
              अंतर्जातीय विवाह आज के परिवेश में बढ़ रहे हैं और समाज द्वारा स्वीकार भी किये जा रहे हैं , उससे विवाह संस्था के स्थायित्व पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ रहा है क्योंकि अंतर्जातीय विवाह तभी होते हैं जब दो लोगों में अच्छा सामंजस्य होता है। 
               लिव इन का प्रभाव विवाह के साथ साथ परिवार संस्था पर भी पड़  रहा है।  इसमें कोई  कमिटमेंट , जिम्मेदारी या बंधन नहीं होता है और वे स्वतन्त्र होते हैं कभी भी साथ छोड़ देने के लिए। जब कि विवाह में एक सामाजिक और पारिवारिक दबाव रहता है 



संध्या शर्मा : लेखिका , नागपुर --भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबंध मात्र नहीं है , यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का रूप दिया गया है और इसी लिए कहा गया है -  ' धन्यो गृहस्थाश्रमः ' . अनेक परिवर्तन के बाद भी विवाह हमारे समाज में हमेशा जीवित रहेगा।
      यदि वर वधु के बीच आपसी सामंजस्य  है तो विवाह चाहे वैदिक रीति से हो या फिर कोर्ट मैरिज भावात्मक बंधन में कोई अंतर उत्पन्न नहीं होता।
            सजातीय विवाह को हम प्राथमिकता देते हैं  , अंतर्जातीय विवाह होते ही तब हैं जब कि वर और वधु दोनों पहले से परिचित हों और आपसी सामंजस्य हो।  ये अधिक सफल माने जा सकते हैं क्योंकि इनमें परिपक्वता के बाद निर्णय लेते हैं।
              लिव इन सदियों से चली आ रही रखैल व्यवस्था का आधुनिक रूप है , जिसे बड़े ही आधुनिक रूप में युवाओं के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है।    इससे परिवार नहीं बनता बच्चों के हो जाने पर उनकी जिम्मेदारी लेने कोई भी तैयार नहीं होता।

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

अंतर्राष्ट्रीय वयोवृद्ध दिवस !








 

                           आज अंतर्राष्ट्रीय  वयोवृद्ध दिवस है। हर घर में वरिष्ठ लोग होते हैं और हमें उनका सम्मान करना चाहिए।  संयुक्त परिवार के विघटन ने वरिष्ठों को एकाकी बना दिया।  ऐसा नहीं है कई वरिष्ठ आज भी अपने युवावस्था की हनक में रहते हैं और बच्चों को डांटन और गालियां लेना या अपमान करना अपना बड़प्पन समझते हैं जबकि समय के साथ उन्हें खुद को बदल लेना चाहिए
                    कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं की कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं और वे अपने जीवन का सा विषय लगती हैं। आज हम भी घर में अकेले हैं लेकिन सक्षम है तो सब कर लेते हैं लेकिन कल किसने देखा है? हमें कब किस हाल में किसकी जरूरत हो?
              आज के दौर में चाहे संयुक्त परिवार हों या एकाकी परिवार या फिर निःसंतान बुजुर्ग हों। सब  का एक हाल है  वे कभी न कभी मजबूर औरअसहाय हो जाते  हैं। उम्र के इस पड़ाव पर बीमारी , कमजोर दृष्टि या शारीरिक अक्षमता के चलते इंसान इतना मजबूर हो जाता है कि उसे दूसरे दो हाथों के सहारे की जरूरत  होती है - दो युवा या फिर सक्षम हाथों की। सबकी ऐसी किस्मत नहीं होती कि उन्हें हर पड़ाव पर दो हाथों का सहारा मिलता ही रहे . चाहे वे हाथ घर में ही मौजूद क्यों न हों ? फिर जिनके बच्चे दूर हैं चाहे नौकरी के लिए या फिर पढाई के लिए वे तो कभी कभी आकस्मिक दुर्घटना के अवसर पर विवश हो जाते हैं। 

             इस बात विषय के लिए मैं प्रेरित हुई कल की एक घटना से  मैं घर से निकली थी किसी काम से वहीँ पास में रहने  मेरी एक रिश्तेदर अपने गेट पर खड़ीं काँप रही थी , मुझे देखा तो बोली कि पास डॉक्टर के यहाँ तक जाना है बुखार चढ़ा है अकेले जाने की हिम्मत नहीं है। मैंने उन्हें सहारा दिया और डॉक्टर के यहाँ तक ले गयी . वहां से दवा दिलवा कर घर छोड़ गयी। उनके एक बेटी और एक बेटा  है। बेटी शादीशुदा और थोड़ी दूर पर रहती है लेकिन बेटा  साथ में रहता है। वे 74 वर्षीय हैं और बेटे  का कहना है की इस उम्र में तो कुछ न कुछ लगा ही रहता है . इन्हें कहाँ तक डॉक्टर के यहाँ ले जाएँ ? ये शब्द मुझसे एक बार खुद उन्होंने कहे थे। मैं उसे सुन कर रह  गयी लेकिन उनकी माँ  की खोज खबर अक्सर लेने पहुँच जाती हूँ .
                एक वही नहीं है बल्कि कितने बुजुर्ग ऐसे हैं जिनके पास कोई नहीं रहता है या फिर वे दोनों ही लोग रहते हैं। चलने फिरने में असुविधा महसूस करते हैं। ऐसे लोगों के लिए एक सामाजिक तौर पर मानव सेवा केंद्र होना चाहिए .  यह काम सरकार  तो क्या करेगी ? हम समाज में रहने वाले कुछ संवेदनशील लोग इस दिशा में प्रयास करें तो कुछ तो समस्या हल कर ही लेंगे . इसमें सिर्फ सेवा और दया का भाव चाहिए।
                  आज बुजुर्ग जिनके बच्चे बाहर हैं और वे अपने काम या घर के कारण  उनके साथ जाना नहीं चाहते हैं या फिर बच्चे उनको अपने साथ रखने में असमर्थ हैं या फिर उनकी कोई मजबूरी है। माता - पिता  जब तक  साथ हैं तब तक तो एक दूसरे का सहारा होता है,  लेकिन जब उनमें से एक चल बसता है तो फिर दूसरे के लिए अकेले जीवन को  मुश्किल हो जाता है , एक बोझ बन जाता है। तब तो और ज्यादा जब वे बीमार हों या फिर चलने फिरने में अक्षम हों।

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                     इसके लिए हर मोहल्ले में या अपने अपने दायरे में ऐसे युवाओं या फिर सक्षम वरिष्ठ नागरिकों के पहल की जरूरत है कि  एक ऐसी समिति या सेवा केंद्र बनाया जाय जिसमें ऐसे लोगों की सहायता के लिए कार्य किया जा सके . इस काम के लिए बेकार युवाओं को  या फिर समाज सेवा में रूचि रखने वाले लोगों को नियुक्त किया जा सकता है लेकिन जिन्हें नियुक्त किया जाय वे विश्वसनीय और जिम्मेदार होने चाहिए। जो लोग ऐसे बुजुर्गों को अस्पताल ले जाने के लिए, बैंक जाने या ले जाने के लिए , बिल जमा करने के लिए या फिर घर की जरूरतों को पूरा करने वाले सामान की खरीदारी के लिए सहयोग दे सकें . इसके बदले में सेवा शुल्क उनसे उनकी सामर्थ्य के अनुसार लिया जा सकता है और वे इसको ख़ुशी ख़ुशी देने के लिए तैयार भी हो जायेंगे . इस काम को  संस्था अपनी देख रेख में करवाएगी  - जिसमें इलाके के बुजुर्ग और एकाकी परिवारों की जानकारी दर्ज की जाय और उनको कैसा सहयोग चाहिए ये भी दर्ज होना चाहिए। लोगों के पास पैसा होता है लेकिन सिर्फ पैसे होने से ही सारे  काम संपन्न नहीं हो सकते हैं। इसके लिए उन्हें सहयोग की जरूरत होती है। ये सहयोग किसी भी तरीके का हो सकता है। 
             ऐसा नहीं है कि  ये बहुत मुश्किल काम हो क्योंकि काफी युवा सिर्फ झूठी नेतागिरी में विभिन्न दलों के छुटभैयों के पीछे पीछे चल कर जिंदाबाद जिंदाबाद के नारे लगाते हुए मिल जाते हैं और उनको इससे क्या मिलता है? इससे वे भी वाकिफ हैं लेकिन ऐसे युवाओं को सपारिश्रमिक  ऐसे कामों के लिए अगर प्रोत्साहित किया जाय तो समाज के इस वर्ग की बहुत बड़ी समस्या हल हो सकती है.  ऐसे हालत में ये सवाल पैदा होता है कि  ये युवा ऐसे कामों के लिए क्यों तैयार होंगे? उन्हें इस दिशा में समझाना होगा और उन्हें मानसिक  तौर पर तैयार करना   होगा  क्योंकि उन्हें तथाकथित नेताओं और छुटभैयों से कुछ मिलता तो नहीं है लेकिन इस काम से उन्हें आज नहीं तो कल कुछ संतुष्टि तो जरूर मिलेगी .  मानवता एक ऐसा भाव है जिसकी कीमत कभी कम नहीं होती और इसके बल पर ही ये समाज आज भी मानवीय मूल्यों को जिन्दा रखे हुए हैं। भले इसका मूल्य लोग कम आंकते हों लेकिन जो इसको महसूस करता है उसकी दृष्टि में यह अमूल्य है।  इस काम के लिए सोशल साइट्स को अपने लिए काम करने वाले युवाओं को खोजने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है  क्योंकि अपने व्यस्त काम में भी सेवा भाव से जुड़े लोग कुछ समय निकाल  सकते हैं और निकालते  ही हैं। सिर्फ युवा ही क्यों ? कुछ घरेलु महिलायें भी इस काम के लिए समय निकाल सकती हैं जो अपना समय गपबाजी या फिर सीरियल देखने में गुजारती हैं वे इस काम में भी लगा सकती हैं। सिर्फ एक जागरूक महिला के आगे आने की जरूरत होती है फिर उसके साथ चलने वालों का कारवां तो बन ही जाता है। 

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             इसके लिए नियुक्त किये गए युवाओं के विषय में उनकी चारित्रिक जानकारी को संज्ञान में रखना बहुत ही जरूरी होगा क्योंकि अकेले बुजुर्गों के साथ कितनी दुर्घटनाये हो रही हैं और वे भी जान पहचान वालों के द्वारा तो हमारा प्रयास इस जगह अपने उद्देश्य में विफल हो सकता है। इसके लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी काम करने वालों की विश्वसनीयता को परख कर ही नियुक्त किया जा सकता है। मेरे परिचय में एक परिवार है जिसमें तीन बेटे हैं और तीनों ही अपने इष्ट मित्रों , जान पहचान वालों या रिश्तेदारों के लिए उनकी मुसीबत में खबर मिलने पर हर तरह से सहायता करने के लिए तैयार रहते हैं। तीनों नौकरी करते हैं फिर भी अपने सहायता कार्य में कभी भी उदासीनता नहीं बरतते  हैं। अगर दस परिवारों में एक परिवार का एक बेटा  भी ऐसा हो जाय तो फिर हमें अपने काम के लिए कहीं और न खोज करनी पड़े . इस प्रयास को हम व्यक्तिगत स्तर  पर तो कर ही सकते हैं। वैसे मैं बता दूं कि इसकी पहल मैं अपने स्तर  पर बहुत समय से कर रही हूँ . मेरा और मेरे पतिदेव् का फोन नंबर ऐसे हमारे परिचितों के पास रहता है कि जब भी उन्हें जरूरत हो हमें कॉल कर सकते हैं। हम अपनी शक्ति भर उनके लिए  भी संभव है करने को तैयार रहते हैं।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

एक नयी दिशा की ओर :कन्या भोज .!


                            इस वर्ष नवरात्रि के दिनों में हमेशा की तरह कन्यायें खिलानी थी और इसके लिए मेरी मानस पुत्री रंजना यादव  ने मुझसे एक ऐसी कार्यशाला करने का प्रस्ताव रखा कि मुझे उसकी सोच में एक नयी दिशा दिखाई दी।  बच्चों को सब कुछ मुझे ही समझाना था।  पहले सभी बच्चों को जो 3 वर्ष से ऊपर से लेकर १२ वर्ष तक के लडके और लड़कियां थीं।  उनको पहले हमने एक वीडियों दिखाया जो अंग्रेजी में था और सभी बच्चे अंग्रेजी नहीं समझ सकते थे सो उनको चित्र्र का सन्दर्भ देते हुए अच्छे स्पर्श (good touch ) और बुरे स्पर्श (bad touch ) के विषय में बतलाया और उनके निजी अंगों (private parts ) के विषय में जानकारी दी।    Image may contain: text

           समाज की वर्तमान स्थिति से सभी वाकिफ है।  बच्चे चाहे बेटी हो या बेटे सभी असुरक्षित है बल्कि उम्र से बहुत बड़े लोगों से उनको ज्यादा खतरा बना हुआ है।  नवरात्रि में हम कन्या पूजन करते है लेकिन कन्या मिलाना मुश्किल हो जाता है और कई घरों में तो भेजने से इंकार कर दिया जाता है।  आखिर क्यों  ? क्योंकि अब किसी को किसी पर भरोसा जो नहीं रहा। कन्या को भी लोग सिर्फ एक मादा के रूप में देखने जो लगे हैं।  दोष किसका है ? हमारा ही है और इससे हम लड़ दूसरे तरीके से सकते हैं , हमें सिर्फ सोचने की जरूरत है कि हम उन्हें सुरक्षित रखने के लिए कैसे माहौल तैयार करें।
                            ऐसा नहीं है बाल यौन शोषण हमारे ज़माने में भी था लेकिन बाहर काम घर के अंदर अधिक था।  कितने किस्से सामने आ जाते हैं ? आज जब कि हमारी पीढ़ी वरिष्ठों की श्रेणी में कड़ी है , तब हमें इसका रूप बहुत भयावह दिखाई देने लगा है क्योंकि अब लिंग और उम्र का कोई दायरा सुरक्षित नहीं रह गया है।

                             बच्चे इन सब चीजों से परिचित नहीं होते हैं और फिर किसी दूसरे के द्वारा स्पर्श किये जाने पर कुछ बता नहीं पाते हैं और एक दो बार की छोटी घटनाओं के बाद लोग बड़ी घटना को अंजाम दे देते हैं।  इसलिए उनको इससे अवगत कराना बहुत जरूरी था। फिर कि उनके निजी अंगों को छूने का हक़ किसको होता है ? उनके इस विषय में परिवार के बाबा दादी , मम्मी पापा और दीदी भैया के बाद टीचर वह भी अगर महिला है तो।  डॉक्टर भी मम्मी की उपस्थिति में ही छू सकता है।
                             इसके अतिरिक्त भी बच्चो को इस बात से आगाह किया कि वे किसी भी अनजान व्यक्ति या फिर दूर के रिश्तेदार पडोसी आदि के यह कहने पर कि मेरे साथ चलो मैं तुम्हें आइसक्रीम या चॉकलेट खिलाने ले चलता हूँ बगैर अपनी मम्मी और पापा की अनुमति के कभी नहीं जाना है।


                              अगर स्कूल में टॉयलेट के लिए जाना हो तो कभी पढाई के समय के बीच जाना नहीं चाहिए क्योंकि ये जगह पीछे की तरफ एकांत में होती है और उसे समय कोई टीचर या बच्चे बाहर नहीं होते हैं।  सिर्फ स्कूल के नौकर या गार्ड ही रहते हैं तो लंच के समय में  अपने और मित्रों के साथ जाना चाहिए।
               अगर स्कूल की वैनवाला , बसवाला या रिक्शावाला भी वह अकेला हो तो उसके यह कहने पर कि वह कुछ काम निपटा कर घर छोड़ देगा तो उसके लिए राजी न हो।  पडोसी आदि के घर कभी सिर्फ एक सदस्य के होने पर नहीं जाना चाहिए।
                             घर में अगर मम्मी पापा न हों और बच्चों को या बच्चे को घर में अकेला छोड़ कर कहीं गए हों तो उनके आने तक किसी के लिए भी दरवाजा नहीं खोलना चाहिए , भले ही वह कोई भी हो ( घर के सदस्य के अतिरिक्त )  या फिर कोई आकर कहता है कि मम्मी ने वहां बुलाया है तो भी नहीं।
                             बच्चों को पहली बार में दुष्कर्म के विषय में नहीं बताया बल्कि उनको कहा गया कि आज कल लोग अपहरण कर लेते हैं और फिर मम्मी पापा से पैसे मांगे हैं और न देने पर वह कुछ भी कर सकते हैं।  कभी मार देते हैं या फिर और लोगों को दे देते हैं।  भीख माँगने वाले लोगों के बीच छोड़ देते हैं।

                              इतना सब समझाने के बाद उन्होंने क्या समझा ? छोटे और बड़े सभी बच्चों से मैंने प्रश्न पूछे और उन बच्चों ने सही जानकारी प्रदान की यानि कि मैंने जो भी उन्हें समझाया था वह उनको कारण सहित याद रहा।
                              थोड़ा सा माहौल बदलने के लिए  पूछा कि कौन क्या बना चाहता है ? ज्यादातर बच्चों ने टीचर बनने की इच्छा जाहिर की और कुछ बच्चों के डॉक्टर , सिर्फ दो बच्चे ऐसे थे जिन्होंने साइंटिस्ट और बायो टेक्नोलॉजी में पढ़ने की इच्छा जाहिर की।  अभी उनकी दुनियां शायद इतनी  थी। लेकिन ऐसी कार्यशाला अगले और महीनों में करने का विचार है जिसमें कि बच्चों को संस्कार और अपनी संस्कृति से परिचय कराने के विषय में सोचा है।  सब नहीं तो कुछ ही सही अच्छी और सुरक्षित राह पर चलने के लिए सतर्क रहे यही कामना है।  


\                            इसके बाद कार्यशाला में उपस्थित 23 बच्चों को दही , जलेबी और समोसे खिलाये गए और उनको परंपरागत ढंग से रोली का टीका लगा कर स्नैक्स और रुपये देकर विदा कर दिया गया। कन्या भोज

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

ब्लॉगिंग के 9 वर्ष !

                                                             ब्लॉगिंग के ९ वर्ष !
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                           आज से नौ वर्ष पहले इस विधा से परिचित हुई थी और तब शायद फेसबुक से इतनी  जुडी न थी क्योंकि स्मार्ट फ़ोन नहीं थे।  थे तो लेकिन मेरे पास न था और साथ ही आइआइटी की नौकरी में समय भी न था।  लेकिन ऑफिस के लंच  में मैं अपने ब्लॉग पर लेखन जारी रखती थी और काम उसी तरह से कुछ न कुछ चलता ही रहा।
                  फेसबुक और ट्विटर के आने से  लोगों को त्वरित कमेंट और प्रतिक्रिया  आती थी और लोगों को वह अधिक भा गया था और थोड़े में अधिक मिलना हमारी फिदरत है।  धीरे धीरे ब्लॉग का लिखना कम होता गया।  बंद तो बिलकुल भी नहीं किया लेकिन स्मार्ट फ़ोन ने उसकी गति को मंद कर दिया।  नौ वर्ष का समय बहुत लम्बा होता है। फिर से ब्लॉगिंग का जन्मदिन मनाया गया और १ जुलाई से इसको प्राणवायु लेकर जीवित रखने का संकल्प लिया और फिर से इसको लिखना आरम्भ कर दिया है।  बस इसके इस लम्बे सफर ने बहुत सारे अच्छे मित्र और मार्गदर्शक दिए और सबकी शुक्रगुजार हूँ कि अभिव्यक्ति को एक ऐसा मंच मिला जिस पर किसी संपादक , समूह  या व्यक्ति का कोई दबाव न था।
                   अपने साथ ही अपने ब्लॉगिंग से दूर हो गए मित्रों से अनुरोध है कि इस विधा को जारी रखें।  पुस्तके लिखे लेकिन  उनको इस ब्लॉग पर भी साझा करें।  कई ऐसे इलाके भी हैं जहाँ पर ऑनलाइन पुस्तकें नहीं पहुँच पाती है सो ऐसे लोगों को आसानी से पढ़ने का अवसर प्राप्त हो सके।  साथ ही आप अगर दिन में ४ घंटे फेसबुक को देते हैं तो सिर्फ आधा घंटा ब्लॉगिंग को भी दें ताकि ये जारी रहे।
                   एक बार फिर अपने उन सभी ब्लॉग मित्रों को हार्दिक आभार जिन्होंने ने तब से लेकर आज तक उस मित्रता को कायम रखा है फिर भी जो घनिष्ठता ब्लॉग के समय में थी वो फेसबुक में नहीं है।  तब सारे लोग लिखने और पढ़ने वाले ही होते थे और एक दूसरे से जुड़े हैं।  हमारा ब्लॉग परिवार ऐसे ही पल्लवित और पुष्पित हो रहे।

रविवार, 10 सितंबर 2017

आ अब लौट चलें ! ( विश्व ग्रैंड पेरेंट्स डे )

                                          एक समय था जब कि घर की धुरी दादा दादी ही हुआ करते थे या उनके भी बुजुर्ग होते थे तो उनकी हर काम में सहमति या भागीदारी जरूरी थी।  उनका आदेश भी सबके लिए सिर आँखों पर रहता था। शिक्षा के लिए जब जागरूकता आई तो बच्चों को घर से बहार शहर में पढ़ने के लिए भेजा जाने लगा और वे गाँव की संस्कृति से दूर शहरी संस्कृति की ओर  आकृष्ट होने लगे।  फिर वहीँ कमाने भी लगे।  खास अवसरों पर घर आना होता था।  विवाह के बाद पत्नी को भी कहीं शहर साथ ले जाकर रखने की प्रथा शुरू हुई और कहीं बहू गाँव में ही रही और पति शहर में।  मौके या पर्व त्यौहार पर घर चला जाता था। जब लड़कियां भी शिक्षित होने लगी तो यह बंधन टूटने लगे और पति पत्नी दोनों ही शहर के वासी हो गए। पिछली पीढ़ी ऐसे ही चलती रही लेकिन जिस तेजी से एकल परिवारों का चलन बढ़ा कि सास ससुर गाँव या फिर जहाँ वे रहते थे वही तक सीमित हो गए क्योंकि नई पीढ़ी को उनके रहन सहन और आदतों के साथ सामंजस्य बिठाना मुश्किल लग रहा था। पीढ़ी अंतराल के कारण बुजुर्ग भी अपनी सोच नहीं  बदल पाए , बच्चों के पास गए तो अपने समय की दुहाई देकर उनको टोकना शुरू कर दिया और कुछ तो चुपचाप सुन कर उनकी इज्जत का मान रखते रहे लेकिन कुछ ने उनको उनकी औकात दिखा दी।
                               जिनके पास अपना आशियाना था और गैरत थी वो वापस आ गए लेकिन कुछ तो उपेक्षित से कहीं भी रहने के लिए मजबूर हो गए।  वो अगर पति पत्नी हुए तो शांति का जीवन मिला किन्तु क्या वे आपने बच्चों की चिंता से मुक्त हो पाए , लेकिन समय की हवा मान कर समझौता कर जीने लगे।  बहू बेटे का मन हुआ तो कभी होली दिवाली आ गए नहीं तो वह भी नहीं।
                               शहर के खर्चे बढ़ने लगे और दोनों को कमाने की जरूरत पड़ी तो उन्हें आया या मेड लगा लेना ज्यादा सुविधा जनक लगा।  किसी को क्रश में बच्चों को डालना ज्यादा अच्छा लगा लेकिन इससे बच्चों को एक सामान्य जीवन मिला ये तो नहीं कहा जा सकता है। बच्चों को माता पिता के सानिंध्य की जो जरूरत होती है वह कोई पूरी नहीं कर सकता है सिर्फ किसी अपने के।  कुछ बड़े होने पर बच्चों को घर में अकेले रहने की आदत हो गयी।  फिर उनको कंप्यूटर  दे दिया गया और वे कार्टून फिल्म्स देखने लगे , गेम खेलने लगे।  माँ बाप ने समझ कि अच्छा विकल्प मिल गया लेकिन ये भूल गए कि इसके अलावा भी एडवेंचर्स , आपराधिक फिल्में , पोर्न साइट्स और कई अन्य गतिविधियों से भी उनका परिचय होने लगा। वे बच्चे किशोर अवस्था की कच्ची उम्र में बहकने लगे और माँ- बाप से भी दूर होने लगे।  ऐसे बच्चों को नौकर और चोकीदार जैसे लोग भी गलत आदतों का शिकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बच्चे संस्कारविहीन , उत्श्रृंखल और आजाद हो गए।  बचपन से ही बुरी आदतों के शिकार होने लगे उनकी सहनशीलता में कमी आने लगी।
                                     समय के साथ भौतिकता की दौड़ में और बढ़ती आपराधिक प्रवृत्तियों में बच्चों के जीवन असुरक्षित होने लगा।  आये दिन विभिन्न प्रकार की परेशानियों के शिकार होने लगे।  छोटे बच्चों का अपहरण , फिरौती और फिर हत्या की घटनाये आम होने लगी।  नौकर या मेड को घर से निकाल दिया तो बदले की भावना में वह भी ऐसी वारदात को अंजाम देने लगे।
                                      आज विश्व ग्रैंड पेरेंट्स डे क्यों मना  रहे हैं क्योंकि अपनी जड़ों के बिना दुनियां की बदलती सोच के साथ बच्चों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है।  आये दिन की आपराधिक गतिविधियों ने दिल दहला दिया है।  दादा दादी या नाना नानी के सानिंध्य में बच्चे ज्यादा खुश देखे जाते हैं क्यों? क्योंकि उनको एक साथी मिलता है जिससे वे अपनी स्कूल की बातें , टीचर की बातें शेयर कर सकते हैं।  कोई घर में होता है जो गोद  में बिठा कर उन्हें खाना खिला सकता है या फिर कहानी सुना कर सुला सकता है।  बुजुर्गों को भी मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है - ये सिर्फ कहावत नहीं है बल्कि चरितार्थ है क्योंकि अपने बच्चों के बचपन को जीने का उनके पास समय नहीं होता है।  पुरुष नौकरी और स्त्री घर के कामों में जूझती रहती है।  दादा दादी बनाने के बाद ही बच्चे का हर काम कब वह एक शब्द बोला  , कब उल्टा हुआ ? कब उसने बैठना सीखा और कब खड़े होकर चलना सीखा।  ये सब बड़े प्रेम से देखते हैं और अपने बच्चों का बचपन उनमें जीते  हैं।
                                  घर में उनको सुरक्षित वातावरण मिलता है।  संस्कार देने का काम हमेशा से बुजुर्ग ही करते आ रहे हैं और फिर परिवार में एक दूसरे के प्रति प्रेम का पाठ यहीं से तो सीखा जाता है।  बच्चे अगर नौकरों के सहारे में रखे जाए तब भी बुजुर्गों की दृष्टि उन पर बराबर रहती है और उन्हें भी यह भय रहता है कि घर में उनको कोई देखने वाला है। यही कहा जा सकता है कि आ अब लौट चलें।  अपनी उसी संयुक्त परिवार की पृष्ठभूमि में जहाँ छोटे से लेकर बड़े तक सब सुरक्षित हैं।  हर सुख दुःख के साथी है और हमारी भारतीय परिवारों की जो छवि अन्य लोगों के सामने बानी हुई है उसको जीवित रखें।
                

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

मशीन अनुवाद - 6

          मशीन अनुवाद का सफर कुछ अधिक लम्बा हो चुका है फिर भी बहुत कुछ शेष है. यह एक अंतहीन सफर ही तो है जिसको मैं अपने कार्यकारी समूह के साथ और विभिन्न संस्थानों  के साथ मिल कर विगत 22 वर्षों  से  करती चली आ रही हूँ. इस लम्बे सफर में मैंने जिन भाषाओं को इस मशीन अनुवाद के लिए प्रयोग किया है - वे हैं, कन्नड़, तुलुगु, मलयालम, उर्दू, पंजाबी, बंगला हिंदी  , इसके अतिरिक्त गुजराती, संस्कृत में भी इसको प्रयोग करके देखा गया है लेकिन इसको विस्तृत रूप में हमने नहीं किया है. इस सबमें हमारी स्रोत भाषा अंग्रेजी रही है और लक्ष्य भाषाएँ ऊपर अंकित कर ही दी गयीं है,.
                   इस विषय में एक सवाल ये हो सकता है कि क्या आपको ये सारी भाषाएँ आती हैं या फिर इनके बारे में पूर्ण ज्ञान है? तो इसमें मेरा उत्तर नहीं में होगा. मेरा सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी भाषा पर ही अधिकार है. और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में तो मैंने इतने वर्षों में बहुत कुछ किया और सीखा. कैसे मैं बेहतर अनुवाद और बेहतर से बेहतर शब्दों का चयन करके अनुवाद प्रस्तुत कर सकती हूँ और उसके विस्तार के लिए भी मेरा अथक प्रयास रहा है.
                  अन्य भाषाओं के सन्दर्भ में यह कहूँगी कि इसके लिए अन्य भाषाओं के भाषाविद हमारे सहयोगी रहे हैं और कुछ तो पी एच ड़ी छात्र रहे हैं जिन्होंने इसको ही अपने शोध का विषय चुना और एक नई और सार्थक दिशा में कार्य किया. इससे हमें कुछ बहुत अच्छे लाभकारी परिणाम भी मिले. कन्नड़ में मशीन अनुवाद के द्वारा जो सॉफ्टवेर तैयार किया गया वह अपने आप में सम्पूर्ण था और उसके परीक्षण के लिए हमने कन्नड़ के बहुत से लेख, कहानी और यहाँ तक कि उपन्यास भी अनुवादित करके पढ़े. उस समय उसमें पोस्ट एडिटिंग की आवश्यकता पड़ती थी क्योंकि वह हमारे प्रयास की  शैशवावस्था थी . लेकिन फिर उसके द्वारा हम को कन्नड़  साहित्य पढ़ने को मिला तो हमें लगा कि हमारे देश कि अनेकता में एकता वाली बात इससे सत्य सिद्ध हो रही है.हम सबके बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और अपने और उनके साहित्य और अन्य उपलब्ध विषयों की जानकारी प्राप्त करने में पूर्ण रूप से सक्षम हो सकते हैं.
                    आज जब कि हम बहुत आगे निकल चुके हैं तब हम कई भाषाओं के कार्य कर रहे हैं. सम्पूर्ण देश में तो ये मशीन अनुवाद का कार्य लगभग सभी भाषाओं में हो रहा है और इसमें सरकारी संस्थान "CDAC " जैसे संस्था भी सम्पूर्ण देश में सक्रिय है. 
                    अगर हम मशीन अनुवाद की उपयोगिता की दृष्टि से देखें तो इसका शोध की दृष्टि से सर्वाधिक उपयोग है. शोध के लिए सिर्फ एक भाषा के कार्य से ही हम अपने कार्य को सम्पूर्ण समझ लें ऐसा नहीं है. बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले शोध  के लिए हमें जापानी, जर्मन , फ्रेंच आदि भाषाओं के शोधों को देखने कि आवश्यक पड़ती  है तो इनको अंग्रेजी में और अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में अनुवादित करके देखा जा सकता है. जब हम अपने ही देश की सभी भाषाओं से अवगत नहीं है तो विदेशी भाषाओं में पारंगत होने कि बात तो सोची ही नहीं जा सकती है. यही नहीं हमारे देश में ही विभिन्न भाषाभाषी लोग अंग्रेजी भाषा में पूर्ण ज्ञान नहीं रखते हैं तो उनको इसके लिए मशीन अनुवाद के द्वारा अपनी भाषा में अनुवादित करके पढ़ने , शोध करने या फिर साहित्य में रूचि रखने वाले लोग अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ सकते हैं. 
                  ग्रामीण अंचलों में अधिकांश लोग आज भी अपनी भाषा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानते हैं और सिर्फ इसी कारण से वे अपने अधिकारों और सुविदाओं से अनभिज्ञ रहते हैं. ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए अगर कुछ केंद्र स्थापित करके इस सुविधा को वहाँ पहुँचाया जाय तो वे अपने निम्न जीवन स्तर को ऊपर उठाने के साधनों और सुविधाओं से भी अवगत होते रहेंगे. अभी अधिकांश भागों में सरकारी फरमान अंग्रेजी में ही आते हैं और वे आम लोगों कि पहुँच से बाहर होते हैं इस के लिए उनकी अपनी भाषा में अनुवादित होकर अगर उन्हें पढ़ने को मिले तो वे एक जागरुक नागरिक और सक्रिय सहभागिता के अधिकारी बन सकते हैं. राष्ट्र हित में , जन हित में इसकी भूमिका बहुत अहम् है बस आवश्यकता है की हम इसको जन समान्य की पहुँच की वस्तु बना कर प्रस्तुत कर सकें . इसके लिए सरकारी सहयोग अपेक्षित है .

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

मशीन अनुवाद - 5


              मशीन अनुवाद सिर्फ सीधे सीधे वाक्यों के अतिरिक्त भी होता है. अगर हम किसी भी शासकीय पत्र को लें तो उसके लिखने का तरीका और उसकी शब्दावली अलग होती है. इसमें हर शब्द का एक अलग अर्थ हो सकता है. इसके लिए एक अलग शासकीय शब्दों का भण्डारण करते हैं और जब ऐसे पत्रों का अनुवाद होता है तो उसी को प्रयोग करते हैं. वैसे भी हम दैनिक जीवन में भी शासकीय शब्दावली को अलग प्रयोग में लाते हैं बल्कि सिर्फ शासकीय ही क्यों? मेडिकल , फिजिक्स , केमिस्ट्री सभी विषयों के लिए अलग शब्दावली का प्रयोग होता है.
             साधारण में हम " To " का प्रयोग परसर्ग के रूप में करते हैं और इसका अर्थ "को/से"  से लेते हैं लेकिन पत्रावली की भाषा में हम इसको "सेवा में" या "प्रति" के रूप में लेते हैं. मशीन अनुवाद में भी अगर हम पत्रों का अनुवाद करते हैं तो इसको ही प्रयोग करते  हैं.
             इसके साथ ही हम पत्र  में  यदि संक्षिप्त संकेतों का प्रयोग भी करते हैं तो उसका  विस्तृत रूप अनुवाद में प्राप्त होता है.
अंग्रेजी में हम "Ref :" ही लिखते हैं लेकिन अनुवाद करने के लिए मशीन इसको इसके पूर्ण रूप में विस्तृत करके ही अनुवाद देती है. "Ref :" का अनुवाद हमें "सन्दर्भ " ही मिलेगा कुछ और नहीं. सम्पूर्ण पत्र की भाषा को ये शासकीय भाषा में ही अनुवाद करती है.
           इससे हमें ये फायदा होता है कि कई स्थानों पर आने वाले पत्रों की भाषा और अंग्रेजी का गहन ज्ञान न रखने वाले लोगों के लिए भी ये सहज हो  जाता है कि अन्य विभागों से प्राप्त हुई सामग्री का वे अनुवाद करके ठीक से समझ सकते हैं. यहाँ भी द्विअर्थी शब्दों के लिए वही नियम प्रयोग में लाया जाता है  जैसे  कि  अगर हम शासकीय सामग्री का अनुवाद कर रहे हैं तो उसके लिए शासकीय शब्दकोष को प्रयोग करते हैं ताकि उससे अधिक विकल्प प्राप्त न हों.
                       जब हम हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद की बात करते हैं तो   एक प्रश्न हमसे पूछा जाता है कि क्या हमारी मशीन "गया गया गया" का सही अनुवाद दे सकती है. तो हमारा यही उत्तर होता है कि हाँ वो एकदम सही अनुवाद ही प्रस्तुत करेगी. वाक्य विन्यास के अनुसार ही अनुवाद भी होता है. इसमें प्रथम शब्द कर्ता  दूसरा कर्म और तीसरा क्रिया होगा. अतः हमें प्राप्त होने वाला अनुवाद "Gaya went to Gaya " ही होगा. यहाँ हम यह भी बता दें कि अगर कोई शब्द संज्ञा है और उसको हम व्यक्ति , स्थान और क्रिया तीनों रूपों में प्रयोग करते हैं तो भी हमारी मशीन उसको सही ढंग से प्रस्तुत कर देती है.
                       हाँ इसकी कुछ सीमायें भी हैं क्योंकि मशीन को पढ़ाने में हमने व्याकरण की शुद्धता पर भी ध्यान दिया है. इस लिए अगर हम कोई वाक्य अगर गलती से भी गलत लिख देते हैं तो वह हमें ये निर्देश देती है. " frame the sentence again " 
आज कल जो हमारी  मीडिया की भाषा हो गयी है या फिर हम जिसे fluent english कहते हैं उसमें व्याकरण की शुद्धता पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है.  अगर हम कभी किसी समाचार पत्र का कोई समाचार डालकर अनुवाद चाहते हैं तो हमें इस सीमा का ध्यान रखना होता है और अगर नहीं रखते हैं तो मशीन हमको याद दिला देती है. हर मशीन की अपनी सीमा होती है. चाहे हम उससे भौतिक कार्यों के लिए प्रयोग करें या फिर सॉफ्टवेयर  जैसी  चीज को प्रयोग करें. सीमा का तो हमें हर स्थान पर ध्यान रखना ही पड़ेगा. उसको हम उसकी कमजोरी नहीं मान सकते हैं बल्कि मनुष्य अधिक त्वरित कार्य करने वाली मशीन भले मनुष्य के वर्षों के प्रयास का फल हो फिर भी वह अगर मानव भूल का शिकार है तो वह उसको शुद्ध करके हमें नहीं दे सकती है. नियमानुसार वह इस बात के लिए इंगित कर सकती है और हमारे वाक्य को फिर से विन्यास कि सलाह दे सकती है.  वह मनुष्य से  द्रुत गति से काम करके वह मनुष्य के कार्य की गति को बढ़ा ही रही है. मानव भूल जैसी बात के लिए इसमें कोई स्थान नहीं होता है क्योंकि वह जो भी हमने उसको सूचनाएं दे रखी हैं वह उन्हीं को प्रयोग करके हमें प्रदान कर देती है. 
                मशीन अनुवाद कैसे हमारे लिए दिन पर दिन उपयोगी बनता जा रहा है, इसको हम आगामी अंशों में देख सकेंगे.